गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है

July 9, 2008

गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।

(1).

इतनी ऊँची इसकी चोटी कि सकल धरती का ताज यही।
पर्वत-पहाड़ से भरी धरा पर केवल पर्वतराज यही।।
अंबर में सिर, पाताल चरण
मन इसका गंगा का बचपन
तन वरण-वरण मुख निरावरण
इसकी छाया में जो भी है, वह मस्‍तक नहीं झुकाता है।
ग‍िरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(2).

अरूणोदय की पहली लाली इसको ही चूम निखर जाती।
फिर संध्‍या की अंतिम लाली इस पर ही झूम बिखर जाती।।
इन शिखरों की माया ऐसी
जैसे प्रभात, संध्‍या वैसी
अमरों को फिर चिंता कैसी?
इस धरती का हर लाल खुशी से उदय-अस्‍त अपनाता है।
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(3).

हर संध्‍या को इसकी छाया सागर-सी लंबी होती है।
हर सुबह वही फिर गंगा की चादर-सी लंबी होती है।।
इसकी छाया में रंग गहरा
है देश हरा, प्रदेश हरा
हर मौसम है, संदेश भरा
इसका पद-तल छूने वाला वेदों की गाथा गाता है।
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(4).

जैसा यह अटल, अडिग-अविचल, वैसे ही हैं भारतवासी।
है अमर हिमालय धरती पर, तो भारतवासी अविनाशी।।
कोई क्‍या हमको ललकारे
हम कभी न हिंसा से हारे
दु:ख देकर हमको क्‍या मारे
गंगा का जल जो भी पी ले, वह दु:ख में भी मुसकाता है।
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।।

(5).

टकराते हैं इससे बादल, तो खुद पानी हो जाते हैं।
तूफ़ान चले आते हैं, तो ठोकर खाकर सो जाते हैं।
जब-जब जनता को विपदा दी
तब-तब निकले लाखों गाँधी
तलवारों-सी टूटी आँधी
इसकी छाया में तूफ़ान, चिरागों से शरमाता है।
गिरिराज, हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।

रचनाकार: गोपाल सिंह नेपाली

Note: This I read in school days in ncert hindi text book.


कोशिश करने वालों की

July 7, 2008

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

 

रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन


क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी

July 2, 2008

क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

मैं दुखी जब-जब हुआ
संवेदना तुमने दिखाई,
मैं कृतज्ञ हुआ हमेशा,
रीति दोनो ने निभाई,
किन्तु इस आभार का अब
हो उठा है बोझ भारी;
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

एक भी उच्छ्वास मेरा
हो सका किस दिन तुम्हारा?
उस नयन से बह सकी कब
इस नयन की अश्रु-धारा?
सत्य को मूंदे रहेगी
शब्द की कब तक पिटारी?
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

कौन है जो दूसरों को
दु:ख अपना दे सकेगा?
कौन है जो दूसरे से
दु:ख उसका ले सकेगा?
क्यों हमारे बीच धोखे
का रहे व्यापार जारी?
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

क्यों न हम लें मान, हम हैं
चल रहे ऐसी डगर पर,
हर पथिक जिस पर अकेला,
दुख नहीं बंटते परस्पर,
दूसरों की वेदना में
वेदना जो है दिखाता,
वेदना से मुक्ति का निज
हर्ष केवल वह छिपाता;
तुम दुखी हो तो सुखी मैं
विश्व का अभिशाप भारी!
क्या करूं संवेदना लेकर तुम्हारी?
क्या करूं?

रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन


अग्नि पथ

July 2, 2008

अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

वृक्ष हों भले खड़े,
हो घने, हो बड़े,
एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी!-कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
यह महान दृश्‍य है-

चल रहा मनुष्‍य है
अश्रु-श्‍वेद-रक्‍त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

रचनाकार: हरिवंशराय बच्चन


तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!

June 23, 2008

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या!

तारक में छवि प्राणों में स्मृति
पलकों मे नीरव पद की गति
लघु उर पुलकों की संसृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या!

तेरा मुख सहास अरुणोदय
परछाई रजनी विषादमय
यह जागृति वह नींद स्वप्नमय;
खेल-खेल, थक-थक सोने दो
मै समझूँगी सृष्टि-प्रलय क्या!

तेरा अधर-विचुम्बित प्याला
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला;
फिर पूछूँ क्यों मेरे साकी!
देते हो मधुमय विषमय क्या!

रोम-रोम में नन्दन पुलकित;
साँस-साँस में जीवन शत-शत
स्वप्न-स्वप्न में विश्व अपरिचित-
मुझमें नित बनते-मिटते प्रिय!
स्वर्ग मुझे क्या, निष्क्रिय लय क्या!

हारूँ तो खोऊँ अपनापन,
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन,
जीत बनूँ तेरा ही बन्धन;
भर लाऊँ सीपी में सागर
प्रिय! मेरी अब हार-विजय क्या!

चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम,
मधुर राग तू मैं स्वरसंगम,
तू असीम मै सीमा का भ्रम,
काया-छाया में रहस्यमय!
प्रेयसि-प्रियतम का अभिनय क्या!


जाग तुझको दूर जाना!

June 23, 2008

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्‍यस्‍त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हृदय में आज चाहे कंप हो ले,
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्‍योम रो ले;

आज पी अलोक को डोले तिमिर की घोर छाया,
जाकर विद्युत-शिखाओ में निठूर तूफ़ान बोले!

पर तूझे है नाश-पथ पर चिह्न अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्‍या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलयों के पर रंगीले?

विश्‍व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्‍या डुबा देंगे तुझे यह फूल के दल ओस-गीले?

तू न अपनी छाँह को अपने लिए कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रु-कण में धो गलाया,
दे किसे जीवन सुधा दो घूँट मदिरा माँग लाया?

सो गई आँधी मलय की वात का उपधान ले क्‍या?
विश्‍व का अभिशाप क्‍या चिर नींद बनकर पास आया?

अमरता-सुत चाहता क्‍यों मृत्‍यु के उर में बसना?
जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंडी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;

हार भी तेरी बनेगी मानिनी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग को है अमर दीपक की निशानी!

है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियाँ बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना!

Note: This is one of my fav poem which I read in class 11th in NCERT hindi textbook.. 


जब यह दीप थके

June 23, 2008

जब यह दीप थके तब आना।

यह चंचल सपने भोले है,
दृग-जल पर पाले मैने, मृदु
पलकों पर तोले हैं;
दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों मे पहुँचाना!

साधें करुणा-अंक ढली है,
सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर
पावस की सजला बदली है;
विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!

यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है,
सुधि से सुरभित स्नेह-धुले,
ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;
दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!

यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के
चिर उज्जवल अक्षर जीवन की
बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के;
कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!

लौ ने वर्ती को जाना है
वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने
रज का अंचल पहचाना है;
चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!


बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ

June 23, 2008

बीन भी हूँ मैं तुम्हारी रागिनी भी हूँ!

नींद थी मेरी अचल निस्पन्द कण कण में,
प्रथम जागृति थी जगत के प्रथम स्पन्दन में,
प्रलय में मेरा पता पदचिन्‍ह जीवन में,
शाप हूँ जो बन गया वरदान बंधन में
कूल भी हूँ कूलहीन प्रवाहिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं…

नयन में जिसके जलद वह तृषित चातक हूँ,
शलभ जिसके प्राण में वह निठुर दीपक हूँ,
फूल को उर में छिपाए विकल बुलबुल हूँ,
एक होकर दूर तन से छाँह वह चल हूँ,
दूर तुमसे हूँ अखंड सुहागिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं…

आग हूँ जिससे ढुलकते बिंदु हिमजल के,
शून्य हूँ जिसके बिछे हैं पाँवड़े पलके,
पुलक हूँ जो पला है कठिन प्रस्तर में,
हूँ वही प्रतिबिम्ब जो आधार के उर में,
नील घन भी हूँ सुनहली दामिनी भी हूँ!
बीन भी हूँ मैं…

नाश भी हूँ मैं अनंत विकास का क्रम भी
त्याग का दिन भी चरम आसिक्त का तम भी,
तार भी आघात भी झंकार की गति भी,
पात्र भी, मधु भी, मधुप भी, मधुर विस्मृति भी,
अधर भी हूँ और स्‍िमत की चांदनी भी हूँ


पूछता क्यों शेष कितनी रात?

June 23, 2008

पूछता क्यों शेष कितनी रात?

छू नखों की क्रांति चिर संकेत पर जिनके जला तू
स्निग्ध सुधि जिनकी लिये कज्जल-दिशा में हँस चला तू
परिधि बन घेरे तुझे, वे उँगलियाँ अवदात!

झर गये ख्रद्योत सारे,
तिमिर-वात्याचक्र में सब पिस गये अनमोल तारे;
बुझ गई पवि के हृदय में काँपकर विद्युत-शिखा रे!
साथ तेरा चाहती एकाकिनी बरसात!

व्यंग्यमय है क्षितिज-घेरा
प्रश्नमय हर क्षण निठुर पूछता सा परिचय बसेरा;
आज उत्तर हो सभी का ज्वालवाही श्वास तेरा!
छीजता है इधर तू, उस ओर बढता प्रात!

प्रणय लौ की आरती ले
धूम लेखा स्वर्ण-अक्षत नील-कुमकुम वारती ले
मूक प्राणों में व्यथा की स्नेह-उज्जवल भारती ले
मिल, अरे बढ़ रहे यदि प्रलय झंझावात।

कौन भय की बात।
पूछता क्यों कितनी रात?


फूल

June 23, 2008

मधुरिम के मधु के अवतार
सुधा से सुषमा से छविमान
आंसुओं में सहमे अभिराम
तारकों से हे मूक अजान!
सीख कर मुस्काने की बान
कहां आऎ हो कोमल प्राण!

स्निग्ध रजनी से लेकर हास
रूप से भर कर सारे अंग
नये पल्लव का घूंघट डाल
अछूता ले अपना मकरंद
ढूढं पाया कैसे यह देश
स्वर्ग के हे मोहक संदेश!

रजत किरणों से नैन पखार
अनोखा ले सौरभ का भार
छ्लकता लेकर मधु का कोष
चले आऎ एकाकी पार
कहो क्या आऎ हो पथ भूल
मंजु छोटे मुस्काते फूल!

उषा के छू आरक्त कपोल
किलक पडता तेरा उन्माद
देख तारों के बुझते प्राण
न जाने क्या आ जाता याद
हेरती है सौरभ की हाट
कहो किस निर्मोही की बाट!

चांदनी का श्रृंगार समेट
अधखुली आंखों की यह कोर
लुटा अपना यौवन अनमोल
ताकती किस अतीत की ओर
जानते हो यह अभिनव प्यार
किसी दिन होगा कारगार!

कौन है वह सम्मोहन राग
खींच लाया तुमको सुकुमार
तुम्हें भेजा जिसने इस देश
कौन वह है निष्ठुर करतार
हंसो पहनो कांटों के हार
मधुर भोलेपन का संसार!